Friday, March 6, 2026

प्राकृतिक सौंदर्य की गोद में बसा अनमोल शहर डूंगरपुर, जानिए डूंगरपुर क्यों है खास

राजस्थान के दक्षिणी सिरे पर बसा डूंगरपुर, एक ऐसा शहर है जो अपने प्राकृतिक सौंदर्य, ऐतिहासिक धरोहर और अद्भुत खनिज संसाधनों के लिए जाना जाता है। अरावली की ऊँची-नीची पहाड़ियों की गोद में बसा यह इलाका दो विपरीत लेकिन पूरक स्वरूपों का संगम है—एक ओर यह इलाका कठोर और वन्य जीवन से भरपूर है, तो दूसरी ओर उपजाऊ मैदानों और जलस्रोतों से समृद्ध है, जहाँ जीवन हरा-भरा नज़र आता है। डूंगरपुर को विशेष बनाती हैं यहाँ की दो प्रमुख नदियाँ—माही और सोम। ये नदियाँ न केवल यहाँ की जीवनरेखा हैं, बल्कि शहर की हरियाली, कृषि और सांस्कृतिक समृद्धि में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। पहाड़ों की तलहटी से बहती इन नदियों के कारण ही यह क्षेत्र एक अद्वितीय प्राकृतिक संतुलन का उदाहरण बनता है।

इस शहर की पहचान एक और अनमोल खजाने से होती है—यहाँ के पहाड़ों से निकाला जाने वाला हरे रंग का बेशकीमती संगमरमर। दुनियाभर की प्रसिद्ध इमारतों में जिस आकर्षक हरे संगमरमर का उपयोग होता है, उसकी उत्पत्ति डूंगरपुर की धरती से होती है। यह खनिज न केवल इस क्षेत्र को आर्थिक समृद्धि देता है, बल्कि राजस्थान के खनिज मानचित्र पर भी इसे विशेष स्थान दिलाता है। इतिहास की ओर नज़र डालें तो डूंगरपुर की स्थापना सन् 1258 ईस्वी में रावल वीर सिंह ने की थी, जो मेवाड़ के तत्कालीन शासक करण सिंह के ज्येष्ठ पुत्र थे। उन्होंने इस इलाके पर पूर्व से निवास कर रहे भील समुदाय के प्रमुख डुंगेरिया को परास्त कर अपना शासन स्थापित किया और इस नगर को वास्तुकला, शासन व्यवस्था और सांस्कृतिक दृष्टि से समृद्ध बनाया। यह भी उल्लेखनीय है कि शहर का नाम भील मुखिया डुंगेरिया के नाम पर ही रखा गया, जिसे समय के साथ डूंगरपुर के नाम से जाना जाने लगा।

आप राजस्थान के शोर-शराबे से दूर किसी शांत, प्राकृतिक और ऐतिहासिक स्थल की तलाश में हैं, तो डूंगरपुर आपके लिए एक परिपूर्ण गंतव्य हो सकता है।

उदय विलास पैलेस

अद्भुत, अभूतपूर्व और उत्कृष्ट संरचना – उदय विलास पैलेस। महाराजा उदयसिंह द्वितीय के नाम पर उदय विलास पैलेस का नाम रखा गया था। बेजोड़ राजपूत वास्तुशिल्प शैली पर आधारित इसका मंत्रमुग्ध करने वाला रेखांकन है, जिसमें छज्जे, मेहराब और झरोखों में विस्तृत चित्रांकन किया गया है। यहां पाए जाने वाले पारेवा नामक स्थानीय नीले ’धूसर’ पत्थर से बनाई गई संुदर कलाकृति झील की ओर मुखरित है। महल को रानीवास, JUNA MAHALउदय विलास और कृष्ण प्रकाश में विभाजित किया गया है जिसे ’एकथंभिया महल’ भी कहा जाता है। एकथंभिया महल राजपूत वास्तुकला का एक वास्तविक आश्चर्य है जिसमें जटिल मूर्तिस्तम्भ और पट्टिका, अलंकृत छज्जे, जंगला, कोष्ठक वाले झरोखे, मेहराब और संगमरमर में नक़्काशियों की सजावट शामिल है। उदय विलास पैलेस आज एक हैरिटेज होटल के रूप में पर्यटकों को आकर्षित करता है तथा शाही ठाट-बाट का असीम आनन्द देता है।

जूना महल

राजपूती शान का प्रतीक और महल के साथ साथ गढ़ के समान सुदृढ और सुरक्षित है जूना महल। 13वीं शताब्दी में निर्मित जूना महल (ओल्ड पैलेस) एक सात मंज़िला इमारत है। यह एक ऊँची चौकी पर ’पारेवा’ पत्थर से बनाया गया है जो बाहर से एक क़िले के रूप में प्रतीत होता है। शत्रु से रक्षा हेतु यथा संभव गढ़ की प्राचीरों, विशाल दीवारों, संकरे गलियारांे और द्वारों को विराट रूप में योजनाबद्ध तरीक़े से बनाया गया है। अंदरूनी भाग में बने सुंदर भित्ति चित्रों, लघु चित्रों और नाज़ुक काँच और शीशे की सजावट का काम पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देता है। सन् 1818 में ईस्ट इंडिया कम्पनी ने इसे अपने अधिकार में ले लिया था। यह जगह डूंगरपुर प्रिसंली स्टेट की राजधानी थी।

सुरपुर मंदिर

डूंगरपुर से लगभग 3 किलोमीटर दूर ’सुरपुर’ नामक प्राचीन मंदिर गंगदी नदी के किनारे पर स्थित है। मंदिर के आस पास के क्षेत्र में भूलभुलैया, माधवराय मंदिर, हाथियों की आगद और महत्वपूर्ण शिलालेख जैसे अन्य आकर्षण भी हैं।

विजय राजराजेश्वर मंदिर

भगवान शिव और उनकी पत्नी देवी पार्वती को समर्पित ’विजय राजराजेश्वर मंदिर’ गैप सागर झील के तट पर स्थित है। यह अपने समय की उत्कृष्ट वास्तुशिल्प को प्रदर्शित करता है। मंदिर का निर्माण महाराज विजय सिंह द्वारा प्रारम्भ किया गया था एवं जिसे महारावल लक्ष्मणसिंह द्वारा 1923 ई. में पूरा किया गया। दक्षिण प्रवेश द्वार दो मंज़िला है। गर्भ गृह में एक ऊँचा गुबंद है। इसके सामने सभा मंडप है – जो 8 राजसी स्तंभों पर बनाया गया है। इसमें बीस तोरण थे जिनमें से चार अभी भी मौजूद हैं। अन्य सोम नदी में आई बाढ़ के पानी से नष्ट हो गए थे। तीर्थ यात्रियों के द्वारा कई शिलालेख हैं और सबसे पुराना 1493 ईस्वी के अंतर्गत आता है। कई योद्धाओं के अंतिम संस्कार मंदिर के समीप किए गए थे और उनके सम्मान में स्मारक बनाये गये थे। इस मंदिर की बहुत मान्यता है।

श्रीनाथ जी मंदिर

भगवान कृष्ण का यह मंदिर तीन मंजिला कक्ष मंे है, जो यहाँ स्थित तीनों मंदिरों के लिए गोध मंडप, एक सार्वजनिक कक्ष है। 1623 में महाराज पुंजराज ने इस मंदिर का निर्माण कराया। इसका प्रमुख आकर्षण श्री राधिकाजी और गोवर्धननाथ जी की मूर्तियां है। इसी परिसर में श्री बांकेबिहारी जी और श्री रामचन्द्र जी को समर्पित कई मंदिर भी हैं। पर्यटक यहाँ एक गैलेरी देख सकते हैं, जो मुख्य मंदिर में है।

देव सोमनाथ

देवगाँव में स्थित यह मंदिर, अपनी बनावट के लिए प्रसिद्ध है। तीन मंज़िलों में बना यह मंदिर, 150 स्तम्भों पर खड़ा है। देव सोमनाथ के नाम पर 12वीं सदी में बना सोम नदी के किनारे पर एक पुराना और सुंदर शिव मंदिर है। सफेद पत्थर से बने, मंदिर में ऊँचे बुर्ज़ बनाये गये हैं। कोई भी मंदिर से आकाश को देख सकता है। यद्यपि चिनाई में प्रत्येक भाग अपने सही स्थान पर मजबूती से टिकाया गया है, फिर भी यह आभास देता है कि प्रत्येक पत्थर ढह रहा है। मंदिर में 3 निकास हैं, ऐसा प्रतीत होता है कि प्रत्येक गुंबद में एक नक़्काशीदार कमल खिले हैं, जबकि सबसे बड़े गुंबद में तीन कमल खिले हैं। सावन के महीने में यहाँ बड़ी संख्या में दर्शनार्थी आते हैं।

गैब सागर झील: शांत वातावरण में प्रकृति और आस्था की संगमस्थली

डूंगरपुर शहर की हृदयस्थली में स्थित गैब सागर झील, एक ऐसा स्थल है जहाँ प्रकृति की सुंदरता, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक वैभव एक साथ समाहित होते हैं। अरावली की तलहटी में फैली यह झील न केवल यहाँ के लोगों की जीवनशैली का हिस्सा है, बल्कि यह पर्यटकों के लिए भी एक अत्यंत आकर्षक स्थल है। गैब सागर का वातावरण आश्चर्यजनक रूप से शांत है, जहाँ शहर के कोलाहल से दूर केवल पक्षियों की चहचहाहट सुनाई देती है। यही कारण है कि यह झील पक्षियों का पसंदीदा बसेरा बन चुकी है। सर्दियों में तो यहाँ प्रवासी पक्षियों की भी आवाजाही देखने को मिलती है, जो इसकी जैव विविधता को और भी समृद्ध बनाती है। इस झील का सबसे बड़ा आकर्षण है इसके तट पर स्थित श्रीनाथजी मंदिर समूह। यह परिसर केवल धार्मिक महत्व तक सीमित नहीं है, बल्कि शिल्पकला और वास्तुकला का जीवंत उदाहरण भी प्रस्तुत करता है। इस परिसर में प्रमुख रूप से विजय राजराजेश्वर मंदिर स्थित है, जो भगवान शिव को समर्पित है। मंदिर की दीवारों और स्तंभों पर की गई बारीक नक्काशी, उस युग के मूर्तिकारों की अद्भुत कला और डूंगरपुर की समृद्ध स्थापत्य परंपरा का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

झील के किनारे बैठकर जब आप ठंडी हवा में झील की सतह पर खिले कमल के फूलों को निहारते हैं और पानी में अठखेलियाँ करते पक्षियों को देखते हैं, तो यह दृश्य किसी ध्यान की स्थिति जैसा अनुभव देता है। यहाँ की नीरवता और नैसर्गिक सौंदर्य मन को भीतर तक छू जाता है। गैब सागर झील केवल एक जलस्रोत नहीं, बल्कि यह डूंगरपुर की आत्मा है। यह झील एक ओर जहां भक्तों के लिए एक तीर्थ है, वहीं प्रकृति प्रेमियों और फोटोग्राफी के शौकीनों के लिए एक खुला कैनवस। डूंगरपुर आने वाला कोई भी यात्री इस झील के दर्शन किए बिना अपनी यात्रा को अधूरी ही मानेगा।

बादल महल

यह महल वास्तुकला के जटिल डिज़ाइन के लिए प्रसिद्ध है तथा गैप सागर झील के किनारे स्थित है। पारेवा पत्थर का उपयोग करते हुए बनाया गया बादल महल, डूंगरपुर का एक नायाब महल है। गैप सागर झील पर स्थित यह महल अपने विस्तृत आलेखन और राजपूत और मुगल स्थापत्य शैली की एक मिली जुली संरचना के लिए प्रसिद्ध है। स्मारक में दो चरणों में तीन गुंबद और एक बरामदा महाराज पुंजराज के शासनकाल के दौरान पूरा किया गया था। अवकाश गृह या गैस्ट हाउस के तौर पर इस महल का, राज्य के मेहमानों को ठहराने के लिए इस्तेमाल किया जाता था।

बेणेश्वर मंदिर

सोम व माही नदियों में डुबकी लगाने के बाद, बेणेश्वर मंदिर में भगवान शिव की आराधना करने के लिए भक्तगण समर्पण के भाव से आते हैं। इस अंचल के सर्वाधिक पूजनीय शिवलिंग बेणेश्वर मंदिर में स्थित है। सोम और माही नदियों के तट पर स्थित पांच फीट ऊँचा ये स्वयंभू शिवलिंग शीर्ष से पांच हिस्सों में बंटा हुआ है। बेणेश्वर मंदिर के पास स्थित विष्णु मंदिर, एक अत्यंत प्रतिष्ठित संत और भगवान विष्णु का अवतार माने जाने वाले ’मावजी’ की बेटी, जनककुंवरी द्वारा 1793 ई. में निर्मित किया गया था। कहा जाता है कि मंदिर उस स्थान पर निर्मित है जहां मावजी ने भगवान से प्रार्थना करते हुए अपना समय बिताया था। मावजी के दो शिष्य ’अजे’ और ’वाजे’ ने लक्ष्मी नारायण मंदिर का निर्माण किया। यद्यपि ये अन्य देवी देवता हैं, पर लोग उन्हें मावजी, उनकी पत्नी, उनके पुत्र वधू और शिष्य जीवनदास के रूप में पहचानते हैं। इन मंदिरों के अलावा भगवान ब्रह्मा का मन्दिर भी है। माघ शुक्ल पूर्णिमा (फरवरी) यहाँ, सोम व माही नदियों के संगम पर बड़ा भारी मेला लगता है, जहाँ दूर दूर के गाँवों तथा शहरों से लोग तथा आदिवासी, पवित्र स्नान करने व मंदिर में पूजा करने आते हैं।

भुवनेश्वर

डूंगरपुर से मात्र 9 किलोमीटर की दूरी पर स्थित भुवनेश्वर पर्वत के ऊपर स्थित है और एक शिव मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। मंदिर स्वयंभू शिवलिंग के समीप ही बनाया गया है। पहाड़ के ऊपर स्थित एक प्राचीन मठ की भी यात्रा की जा सकती है।

नागफन जी
डूंगरपुर रेल्वे स्टेशन से यह दिगम्बर जैन समुदाय का मंदिर, 35 कि.मी. की दूरी पर है। नागफनजी अपने जैन मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है जो न केवल डूंगरपुर के भक्तों को आकर्षित करते हैं बल्कि दूर दूर से यात्रा पर आये पर्यटक भी इसे देखने के लिए लालायित रहते हैं। यह मंदिर देवी पद्मावती, नागफनी पार्श्वनाथ और धरणेन्द्र के प्रतिमाओं के मंदिर हैं। नागफनजी शिवालय जो इस मंदिर के नजदीक स्थित है, यह भी एक पर्यटक आकर्षण है। इस स्थान पर गुरू पूर्णिमा पर विशेष आयोजन होता है।

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